संथाल विद्रोह का इतिहास।एक आदिवासी प्रतिरोध की कहानी


संथाल विद्रोह का इतिहास।एक आदिवासी प्रतिरोध की कहानी


संथाल विद्रोह (1855–1856): एक आदिवासी प्रतिरोध की कहानी

संथाल विद्रोह, जिसे संथाल‑हूल भी कहा जाता है, अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ उत्तर‑पूर्वी भारत में उठा सबसे बड़ा सशस्त्र आदिवासी विद्रोह था। यह विद्रोह 30 जून 1855 को औपचारिक रूप से शुरू हुआ और 1856 के जनवरी–मध्य तक चलते‑चलते काफी हद तक दमित हो गया। आज भी इसे आदिवासी अधिकारों, जमीनी शोषण और भूमि के विरुद्ध लड़ाई का प्रमुख प्रतीक माना जाता है।

भूमिका: संथाल जनजाति कौन हैं?

संथाल भारत के पूर्वी क्षेत्र, विशेषकर आज के झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा के कुछ भागों में बसने वाली एक प्रमुख आदिवासी जाति हैं। वे अपनी भाषा, रीति‑रिवाज और जमीन के प्रति अद्वितीय आस्था के लिए जाने जाते हैं। 18वीं–19वीं शताब्दी के समय यह क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में था और यहीं पर उन्हें जमींदारी प्रथा, लगान वसूली और उच्च ब्याज वसूलने वाले साहूकारों के सामने झुकना पड़ा।

संथाल विद्रोह का स्थान और क्षेत्र।

इस विद्रोह का केंद्र आज के झारखंड के पूर्वी हिस्से में स्थित “संथाल परगना” या “दमन‑ए‑कोह” के नाम से जाना जाने वाला क्षेत्र था, जो राजमहल की पहाड़ियों से लेकर भागलपुर और बीरभूम तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र में लगभग 60,000 से अधिक संथाल परिवार रहते थे और वे अपनी जमीन को खेती और वन संपदा पर निर्भरता से जीवन जीते थे।

विद्रोह के मुख्य कारण।

संथाल विद्रोह के पीछे कई आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक कारण थे:

1. जमींदारी व सरकारी लगान का दबाव।

ब्रिटिश शासन ने “स्थायी बंदोबस्त” के बाद भारी लगान की व्यवस्था शुरू की। संथाल किसान अक्सर इस लगान को समय पर नहीं चुका पाते थे, जिसके बाद उनकी जमीन जप्त, घर और मवेशी हड़प लिए जाते थे। इससे उनकी आर्थिक दशा बेहद खराब हो गई। 

2. साहूकार और महाजनों का जबरन सूद।

साहूकारों ने कमजोर संथालों को छोटे‑छोटे कर्ज देकर उन्हें कर्ज के जाल में फंसा दिया। ब्याज की दर 50 से 500 प्रतिशत तक पहुंच सकती थी, जिससे गरीब किसान कभी भी कर्ज से मुक्त नहीं हो पाता।

3. भूदान और भूमि का अधिग्रहण।

संथाल समुदाय ने पहले राजमहल की जंगली जमीनों को काटकर, खेती योग्य बनाकर अपने गांव बसाए थे, लेकिन बाद में कंपनी और जमींदार इस भूमि पर अपने अधिकार जताने लगे। इससे संथालों को अपनी खुद की जमीन से वंचित होना पड़ा, जो उनके लिए सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भी आघात था।

4. सामाजिक अपमान और यौन शोषण।

सरकारी अधिकारी, पुलिस और जमींदार अक्सर संथालों पर दमनकारी व्यवहार करते थे। आदिवासी महिलाओं के साथ यौन शोषण जैसी घटनाएं भी होती थीं, जिससे समुदाय की इज्जत डगमगाई।

5. सरकार से न्याय की उम्मीद टूटना।

संथालों को लगने लगा कि कानून और व्यवस्था केवल बाहरी लोगों (जमींदार, महाजन, अंग्रेज) के लिए हैं, न कि उनके लिए। दर्जनों शिकायतें देने के बावजूद संथालों को न्याय मिलता नहीं दिखा, जिससे उनकी निराशा हिंसक विद्रोह में बदल गई।

6. विद्रोह के नेतागण: सिद्धू‑कान्हू और चाँद‑भैरव।

संथाल विद्रोह का नेतृत्व चार भाई‑बहनों ने किया: सिद्धू मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चाँद मुर्मू और भैरव मुर्मू। ये सभी संथाल समुदाय के भीतर काफी प्रभाव रखते थे।

  • सिद्धू और कान्हू ने दावा किया कि उनकी स्थानीय देवता ठाकुर बोंगा ने उन्हें बाहरी शोषणकर्ताओं (अंग्रेज, जमींदार, महाजन) को हटाकर संथाल‑केंद्रित एक नई व्यवस्था बनाने का दिव्य आह्वान दिया है। इस तरह धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक विद्रोह से जोड़कर उन्होंने सम्पूर्ण समुदाय को एकजुट किया।
  • चाँद और भैरव भी अपने‑अपने गांवों में जुलूस निकाल, शिक्षा देकर और गांव‑गांव जाकर लोगों को जागरूक किया। बाद में ये चारों नेता संथालों के लिए “सूबे ठाकुर” जैसी उपाधियों के साथ जाने गए। 

विद्रोह की शुरुआत: 30 जून 1855 का दिन।

30 जून 1855 को भोगनाडीह नामक गाँव में सिद्धू‑कान्हू ने लगभग 10,000 संथालों को एक सभा में इकट्ठा किया। इस सभा में उन्होंने स्पष्ट रूप से अंग्रेजी शासन, जमींदारों और साहूकारों के खिलाफ विद्रोह की घोषणा की। इस मौके पर उन्होंने यह भी ऐलान किया कि अब संथाल अपनी जमीन पर खुद की व्यवस्था चलाएंगे और बाहरी “चाहट” (कर) को अस्वीकार करेंगे।

कुछ दिनों के भीतर विद्रोह तेजी से फैल गया। संथाल लोगों ने जमींदारों, महाजनों और कुछ सरकारी ठिकानों पर हमला करना शुरू कर दिया। 1 जुलाई को एक बाजार में पांच महाजनों की हत्या कर दी गई, जो विद्रोह की पहली बड़ी हिंसक घटना मानी जाती है। 

“संथाल हूल” का विस्तार और गुरिल्ला रणनीति“हूल” शब्द का अर्थ “उठान” या “विद्रोह” है। इसलिए संथाल विद्रोह को स्थानीय भाषा में “संथाल हूल” कहा जाता है।

जैसे‑जैसे संख्या बढ़ी,विद्रोही संथाल लगभग 1500–2000 के छोटे‑छोटे समूहों में बंटकर आगे बढ़े और निर्धारित गाँवों के ठिकानों, जमींदारों के मकानों और साहूकारों के घरों पर भारी हमले करते रहे। वे जमीन की स्थिति, झाड़ियों और पहाड़ियों का फायदा उठाते हुए गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाते थे – छिपकर हमला करना, जल्दी वापस झाड़ियों में घुस जाना और फिर दूसरे स्थान पर दिखना। यह रणनीति उन्हें ब्रिटिश सैनिकों के सामने अस्थायी रूप से लाभकारी बनाती थी, क्योंकि वे जंगल‑पहाड़ के इलाके में बेहद जानकार थे, जबकि अंग्रेज उस भौगोलिक वातावरण से अपरिचित थे।



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